जीवन-दर्शन के सूत्र

(1) “ अगर इन्सानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतन्त्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना उचित है ।” -- डॉ. भीमराव आम्बेडकर (2) “ मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ । जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उस की आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है ।” -- आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

जाति-भेद के दंश से निकला दर्शन | डॉ.आंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि (भाग -1)

ज्ञान-यात्रा का सार : जनता का उद्धार | महापंडित राहुल सांकृत्यायन | 9 अप्रैल, 2026 (राहुल जयंती)

बाइबिल् क्या 'एक' किताब नहीं है? उसकी भाषा और इतिहास | Easter की तारीख निश्चित क्यों नहीं रहती?