जीवन-दर्शन के सूत्र

(1) “ अगर इन्सानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतन्त्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना उचित है ।” -- डॉ. भीमराव आम्बेडकर (2) “ मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ । जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उस की आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है ।” -- आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

मंगलवार, 25 जून 2013

स्त्री-विमर्श की दृष्टि में हिन्दी-व्याकरण की सृष्टि



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यह व्याकरण किस ने बनाया ?




यह व्याकरण किसने बनाया?
(अर्थात लिंग-विमर्श के लिंग-भेद का सांस्कृतिक नेपथ्य)
पर्वत पर्वत है और नदी नदी है। लेकिन जब वे व्याकरण की गिरफ्त में आते हैं, तब पुंलिंग और स्त्रीलिंग बन जाते हैं। इस रिसर्च पेपर के लेखक रवीन्द्र कुमार पाठक का कहना है, भाषा-व्याकरण में 'लिंग' नामक अवधारणा सदियों से समाज में चल रहे स्त्री-पुरुषमूलक विभेद-भावना का ही प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि (जैसा समाज में रहा है, वैसे ही) स्त्रीलिंग पर पुंलिंग का वर्चस्व भी दिखलाती है। हो सकता है कि भाषा से लिंग-भेद मिट जाए, पर अवधारणा के स्तर पर 'व्याकरण' में लिंग मौजूद रहे, जैसा कि अंग्रेजी में है अथवा कुछ नहीं तो वैयाकरण मन में कार्यरत पितृसत्तात्मक मूल्य, उदाहरण देते समय अपना काम करते रहें - स्त्री को हीन रूप में और पुरुष को दबंग रूप में पेश करते हुए। इसलिए कहना होगा कि समाज या भाषा में सुधार चाहे देर से ही हो, किंतु व्याकरण व वैयाकरण को तो अपने स्तर से ऐसे प्रयास शुरू कर देने चाहिए, जिससे लिंग-भेद व पुरुष-वर्चस्व की स्थितियाँ हतोत्साह होती जायें तथा स्त्री- सशक्तीकरण का संदेश अँगड़ाई लेने लगे। 



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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

बलात्कार से लड़ने के लिए हिम्मत और ईमानदारी चाहिए

पितृसत्तात्मक संस्कृति के अन्तर्गत स्त्री व्यक्ति नहीं; संवेदनाओं, इच्छाओं-सपनों व आत्मसम्मान से भरी इन्सान नहीं, बस एक देह है, जिस का अस्तित्व मर्दों के सुख/मनोरंजन के लिए माना गया है । ऐसी संस्कृति के रहते उस का बलात्कार होना कोई हादसा नहीं, बल्कि वैध व स्वीकृत जीवन-मूल्य की तरह है, जो कभी-कभी नहीं, आये दिन भी नहीं, नियमित रूप से हर कहीं होता है या हो सकता है ।  अगर स्त्री के बलात्कार के विरुद्ध ईमानदारी से लड़ना है, तो सब से पहले हमें अपने सामन्ती संस्कारों एवं अपनी उस संस्कृति से घृणा करने की हिम्मत जुटानी होगी, जिस में जीविका के लिए निकली, राह चलती हर लड़की (गोपी) को कोई बड़े बाप का लड़का (कृष्ण) छेड़छाड़ या यौन-ग्रास का शिकार बना लेना अपना पैदायशी हक समझता है । हम ऐसों को जेल भेजने की जगह, भगवान् मानते हैं, उन की यौन-लंपटता को लीला का दर्जा देते हैं । स्त्री को गोश्त बनाए रखने की सामन्ती संरचना को पूँजीवादी विस्तार देते हुए ( मिसवर्ल्ड, फैशन शो, यौनलोलुपता की छौंक वाले विज्ञापन व आईटम सोंग आदि) मीडिया व मनोरंजन जगत् के कर्त्ता-धर्त्ता जब बलात्कार के विरुद्ध लड़ाई का दम्भ भरते हैं, तो मुझे अचरज नहीं होता, क्योंकि ट्रेन में बेटिकट चलना, दहेज लेना और साथ में अन्ना हजारे का झण्डा भी उठाए चलना हमारा राष्ट्रीय पाखण्ड-चरित्र है । हकीकत तो यह है कि बलात्कार की सबसे ज़्यादा घटनाएँ विवाह/परिवार की सीमा में घटती हैं, जो भारतीय समाज में अब तक किसी विमर्श या लड़ाई में कोई मुद्दा ही नहीं बन सकी हैं । ( हाँ, ‘घरेलू हिंसा कानून २००५’ में पति द्वारा पत्नी पर जबरन यौन-सम्बन्ध थोपने को आपराधिक गतिविधि से जरूर जोड़ा गया है ) ।  पुरुष द्वारा अपनी विवाहिता स्त्री के प्रथम बलात्कार को हमारी परम्परा ने सुहागरात के मनभावन शब्द में ढँक रखा है । आये दिन बलात्कार की शिकार लड़की को उस के बलात्कारी से विवाह के लिए राजी कर मामले का कानूनी निबटारा करने की भी खबरें सुनने में आती हैं । विवाह स्त्री के बलात्कार को वैधता प्रदान करने वाली संस्था बनी हुई है । बलात्कार की मानसिकता जहाँ मर्दानगी के नाना रंग-बिरंगे मिथकों व लोकोक्तियों (जैसे- जमीन-जोरू जोर के, न तो किसी और के ) में आकार पाती हो, वहाँ सिर्फ़ कुछ यौन-पिशाचों को पकड़ कर खत्म कर देना इस विकराल समस्या के अन्त की दिशा में बहुत नाकाफी कदम होगा । फिर भी, एक कायदे का कानून और उसे लागू करने वाली चुस्त-दुरुस्त एजेंसियाँ तो चाहिए ही । कानून की छतरी होगी, तभी तो पीड़िता को उस के नीचे ले जाकर बचाया और अपराधी को दण्डित कराया जा सकता है । पर, समस्या के असली समाधान के लिए संस्कृति के अंग-प्रत्यंग ( साहित्य, लोकाचार, सिनेमा, बाज़ार, समाज/परिवार सब ) में निहित स्त्री को भोज्य पदार्थ की तरह चित्रित करने व परोसने; बेटियों को हर उचित चाह/अधिकार के आयाम में दबा कर रखने तथा अपने राह चलती हर लड़की पर फिकरे कसते अपने मर्द बेटों ( बूढ़ों तक ) को बढ़ावा देने, सहने और कभी-कभी सराहने की प्रवृत्ति से लड़े बिना बलात्कार के कीटाणुओं को पैदा होने से नहीं रोका जा सकता |
                       

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

व्याकरण-शिक्षण की समुचित विधि (सारांशिका)


भाषा एक बहु-समर्थ संरचना है, उसी में हमारा सबकुछ व्यक्त होता है।  इन्सान की भाषा सीखने की प्रवृत्ति जन्मजात होती है, जिसके कारण अपने भाषिक समाज में रहते हुए वह भाषा सुनता है, भाषिक प्रयोग देखता है, मन ही मन उनका विश्लेषण करता है और इस तरह से भाषा के नियमों को आत्मसात् करते रहता है। इसी प्रक्रिया से निरन्तर गुजरते, वह नियमबद्ध व्यवहार के रूप में कोई भाषा सीखता है।
कोई भाषा अन्ततः कुछ खास नियमों के अनुसार बनी व्यवस्था है । समेकित रूप में उन नियमों को व्याकरण कहा जाता है । वह ;व्याकरण अव्यक्त / अमूर्त्त होता है, जिसे भाषा के विशेषज्ञ भाषा-विश्लेषण के रूप में व्यक्त / मूर्त्त करते हैं । आमतौर पर उसी मूर्त्त रूप को ‘व्याकरण’ कहा जाता है ।  इस अर्थ में व्याकरण की रचना भाषा-प्रयोगों को समझने और उस के विश्लेषण के रास्ते होता है । भाषा-प्रयोग (वाक्य/प्रोक्ति) के विविध घटकों की अलग-अलग पहचान करना, उन के सम्बन्धों को पहचानना, उन का नामकरण और वर्गीकरण करना - यही व्याकरण-प्रक्रिया है, जिस के परिणामस्वरूप व्याकरण जैसा शास्त्र आकार लेता है । व्याकरण के ज्ञान से भाषा के आन्तरिक रहस्यों का बोध होता है, जिस से भाषाई कौशलों व सृजनशीलता के विकास का अवसर बनता है ।
    व्याकरण-शिक्षण की अब तक प्रचलित रही विधि में न केवल एकमुखी उपदेशात्मकता तथा ऊबाऊपन होता है, बल्कि उस के ज़रिये सीखा गया व्याकरण भी भाषा-प्रयोग के वास्तविक सन्दर्भों से कटा होता है । उस से व्याकरण भाषा में बाहर से ला कर चिपकाया गया लगता है, यानी उस से उपर्युक्त व्याकरण-प्रक्रिया का कुछ भी अता-पता नहीं लगता और उस से व्याकरण भाषा सीखने या भाषिक कौशलों के विकास का साधन न रह कर, खुद ही साध्य हो जाता है । जबकि व्याकरण  सिखलाना लक्ष्य नहीं होना चाहिए ।  लक्ष्य होना चाहिए - भाषा में रुचि जगाना, भाषा सिखलाना या कम से कम भाषा-प्रयोग में दक्ष बनाना ।
    उस की जगह यदि भाषा-प्रयोगों के सन्दर्भ में व्याकरण सिखलाया जाए, तो वह न केवल हमारी मानसिक प्रक्रिया के संगत है, वरन कई प्रकार से लाभकारी भी है । जिस घरेलू/सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक और इन सब से निर्मित भाषिक परिवेश में हम रहते हैं, उसी के प्रति सचेत करते, उसी को आधार या उदाहरण बना कर, उस में निहित व्याकरण को समझने की क्षमता विकसित करना व्याकरण-शिक्षण की सही विधि है । उस से - (१) प्रशिक्षु भाषा-विशेष की संरचना समझ सकता है (२) संरचना समझ कर वैसा नया प्रयोग खुद कर सकता है (३) उस संरचना का अतिक्रमण कर के नयी-नयी दिशा में नयी-नयी संरचना उत्पन्न कर,  भाषा को और सृजनशील बना सकता है ।
   सन्दर्भ में व्याकरण सिखलाने से प्रशिक्षु को यह बोध होगा कि कोई भी भाषिक/व्याकरणिक तत्त्व वास्तविक भाषा-प्रयोग के धरातल पर कैसे कार्य करता है ? सन्दर्भ से टकराते भाषा में उस की रुचि जगती या बढ़ती है । सन्दर्भ उस के मन में संस्कार की तरह बैठा होता है, इसी से सन्दर्भ में कुछ भी (व्याकरण) सीखना उस के लिए अलग से अभ्यास-साध्य नहीं रह जाता । जीवित प्रयोगों के सन्दर्भ में व्याकरण को समझना उस की भाषा को जीवन्त व सर्जनात्मक बनाने में मददगार होता है ।
   इस के अलावा, सन्दर्भ में व्याकरण सीखना इसलिए भी उचित है, क्योंकि कोई भी व्याकरणिक परिभाषा या कोटि भाषा-प्रयोग के सन्दर्भ में ही खड़ी होती है, उस के बिना सम्भव ही नहीं है । जैसे - ‘टहलना’ क्रिया है या संज्ञा , इस का पता बिना वाक्य-प्रयोग के नहीं चल सकता । ‘तुम सुबह उठकर फुलवारी में टहलना’ में यदि यह क्रिया है, तो ‘टहलना अच्छा व्यायाम है’ में यह संज्ञा है ।  इसी तरह, भाषा-प्रयोगों के सन्दर्भ में व्याकरण सीखने-सिखलाने के अनेक सैद्धान्तिक व व्यावहारिक लाभ हैं, जो शिक्षण-प्रक्रिया के दौरान प्रकट होते हैं तथा आगे भी कई रूपों में प्रतिफलत होते हैं ।

एस.एन.सिन्हा कॉलेज, जहानाबाद में सेमिनार के दौरान ‘व्याकरण-शिक्षण की समुचित विधि’ पर व्याख्यान